श्री साँवलिया सेठ प्राचीन मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर आपका स्वागत है।
श्री साँवलिया सेठ के तीन मंदिरो में सबसे प्राचीन मंदिर चित्तौड़गढ़ के भादसौड़ा गाँव में स्थित है। यह मंदिर NH-27/NH-48 पर चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय और रेलवे स्टेशन से 35 किमी दूर और डबोक एयरपोर्ट उदयपुर से 60 किमी पर स्थित है ।
हर वर्ष यह प्राचीन मंदिर अपनी अद्भुत शोभा और अनुपम विशेषताओं से हजारों भक्तों को अपनी ओर खींच लाता है।
सांवलिया सेठ मीराबाई द्वारा पूजे जाने वाले वही ‘गिरधर गोपाल’ हैं, जिन्हें वह कृष्ण कहकर पुकारती थीं, और सांवलिया जी मंदिर में उन्हीं श्रीकृष्ण की मूर्ति की पूजा होती है, जो मीराबाई की भक्ति और कृष्ण प्रेम का प्रतीक है। उनके पास श्रीकृष्ण की मूर्तियां थी जिसे बाद में संत दयाराम ने मुगलों से बचाने के लिए छिपा दिया था, और यही मूर्ति कालांतर में सांवलिया सेठ के रूप में प्रकट हुई।
सांवलिया सेठ के बारे में यह मान्यता है कि गुजरात के प्रसिद्ध कवि संत और व्यापारी नरसी मेहता की बेटी नानी बाई का मायरा भरने के लिए स्वयं श्री कृष्ण ने साँवल सेठ का रूप धारण किया और मायरा (भात) भरा इसलिए सांवलिया सेठ कहलाये।
इस प्राचीन मंदिर भादसौड़ा की मुख्यतः तीन विशेषताएं है।
1. साँवलिया सेठ की यह सबसे बड़ी मूर्ति है जिसकी ऊंचाई 24 इंच है।
2. श्री साँवलिया सेठ के सीने पर स्थित पैर का अद्भुत निशान – मान्यता है कि यह भृगु ऋषि के पैर हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि भृगु ने त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) में श्रेष्ठ का चुनाव करने के लिए विष्णु की छाती पर लात मारी थी, ताकि उनकी सहनशीलता और विनम्रता की परीक्षा हो सके, भगवान् विष्णु ने बिना गुस्सा क्षमा मांगते हुए ऋषि भृगु के पैर की चोट पर चिंता जताई| भगवान् विष्णु और भृगु ऋषि के प्रसंग को दर्शाने वाली यह दुनिया की इकलौती मूर्ति है।
इसके दर्शन केवल भक्तों को 10 मिनट के लिए होते हैं। इसके लिए सुबह 4.50 बजे से 5 बजे तक का समय रखा गया है।
3. श्री साँवलिया सेठ के चरण दर्शन : इस बड़ी मूर्ति में ही ठाकुर जी के चरणों के दर्शन संभव हैं, सांवलिया सेठ की अन्य 2 मूर्तियों में ये सुविधा नहीं है।

