इतिहास

भादसोड़ा गाँव का 1000 साल से भी पुराना इतिहास है। अजमेर व देहली के शासक वीर पृथ्वीराज चौहान की बहन पृथा का विवाह चित्तोड़ के राणा समर सिंह के साथ हुआ था। विवाह के बाद पृथा के साथ दासियाँ व चारण सरदार चित्तोड़ आ गए जिन्हें राणा समरसिंह ने 12 गाँव जागीर में दिए थे। इन गावों में भादसोड़ा गाँव भी शामिल था।

सन 1840 में वर्तमान श्री सांवलिया सेठ प्राकट्य स्थल से भगवान् कृष्ण की सांवलिया स्वरुप तीन प्रतिमाएं प्रकटी ।भादसोड़ा में सुथार जाति के अत्यंत ही प्रसिद्ध गृहस्थ संत पुराजी भगत रहते थे। उनके निर्देशन में इन मूर्तियों की सार संभाल की गयी तथा उन्हें सुरक्षित रखा गया। उनमे से श्री साँवलिया सेठ की पहली सबसे बड़ी मूर्ति भादसोड़ा गाँव ले जाई गयी जहाँ भींडर ठिकाने की ओर से भगतजी के निर्देशन में सांवलिया जी का मंदिर बनवाया गया। दूसरी मूर्ति प्राकट्य स्थल पर ही स्थापित की गयी जो आज श्री सांवलिया सेठ प्राकट्य धाम बागुंड-भादसोड़ा के नाम से प्रसिद्ध है ।
तीसरी मूर्ति मण्डफिया गाँव ले जाई गयी वहा भी सांवलियाजी मंदिर बना कालांतर में जिसकी ख्याति भी दूर-दूर तक फेली। 

श्री साँवलिया सेठ के तीन मंदिरो में सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण हुआ इसलिए इसे श्री सांवलिया सेठ प्राचीन मंदिर भादसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है।

भादसोड़ा के ही श्री मोतीलाल जी मेहता ने मंदिर की धार्मिक परंपराओं और समग्र व्यवस्थापन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके मार्गदर्शन और प्रयासों से मंदिर एक सुव्यवस्थित एवं सजीव आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

उनके मार्गदर्शन में नित्य पूजा, विशेष पर्वों के अनुष्ठान और वार्षिक उत्सवों का संचालन विधि-विधान के साथ किया जाने लगा। 

श्री सांवलिया जी से प्रेरणा पाकर ही श्री मोतीलालजी मेहता ने वर्ष 1961 से देवझूलनी एकादशी के अवसर पर विशाल मेले के आयोजन की परंपरा प्रारंभ की। यह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा आज भी श्रद्धा और भक्ति के साथ निरंतर चली आ रही है।

प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी, एकादशी एवं द्वादशी को तीन दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु एवं धर्मप्रेमीजन सम्मिलित होते हैं।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के पावन दिवस पर भादसोड़ा से भगवान के बाल रूप की शोभायात्रा निकाली जाती हैं। इस शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु अत्यंत उत्साह, उल्लास और भक्ति भाव के साथ भाग लेते हैं।  शोभायात्रा जब श्री सांवलिया सेठ प्राकट्य स्थल स्थित मंदिर में पहुँचती हैं, तो एक विशाल जुलूस का रूप धारण कर लेती हैं।

इसके पश्चात मंदिर प्रांगण में विधिपूर्वक भगवान को पावन स्नान कराया जाता है, जो भक्तों के लिए अत्यंत भावविभोर करने वाला आध्यात्मिक क्षण होता है।

मंदिर व्यवस्थापन के क्षेत्र में मेहताजी ने सेवा, पारदर्शिता और सामूहिक सहभागिता को आधार बनाया और ग्रामवासियों के सहयोग से मंदिर की व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से संचालित किया । 

प्रतिमाह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सांवलियाजी का दानपात्र(भंडार) खोला जाता है।

sanwariya seth temple donation QR code details chittorgarh
sanwariya seth temple donation QR code details chittorgarh

This will close in 20 seconds